ऋतु फागुन नियरानी हो | कबीर सबद
अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल

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ऋतु फागुन नियरानी हो | कबीर सबद (सबद) 
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Author:कबीरदास

तु फागुन नियरानी हो, कोई पिया से मिलावे ॥ टेक ॥
सोई तो सुदंर जाके पिया को ध्यान है,
                              सोइ पिया के मन मानी।

खेलत फाग अगं नहिं मोड़े, सतगुरु से लिपटानी ॥ १ ॥

 

इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची, इक इक कुल अरुझानी ।
इक इक नाम बिना बहकानी, हो रही ऐंचातानी ॥ २ ॥

 

पिय को रूप कहाँ लग बरनौं, रूपहि माहिं समानी ।
जौ रँगे रँगे सकल छबि छाके, तन- मन सभी भुलानी ॥ ३


यों मत जाने यहि रे फाग है, यह कछु अकथ कहानी ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, यह गति बिरले जानी ॥ ४ ॥

- कबीर

 

 

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